“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, सुबह को भेजे शाम को भूले”


व्यक्ति में अहंकार है दूसरों की सुनना नही बस सबको सुना देना ही पसंद करता है।

और सबसे बड़ी बात तो जब से ये मोबाइल देवता का आगमन हुआ है ना..! लोगों ने अपने जीवन की पूरी कार्यकारिणी ही मोबाइल देवता द्वारा निर्धारित कर ली है
सभी रिश्ते-नाते, दोस्ती, दुश्मनी, प्रेम, नफ़रत जुड़ना-जुड़ाना तोड़ना-तुड़वाना इत्यादि सभी काम इसी के द्वारा किए जा रहे है..

अब फिर हुआ यूँ की तकनीकी ने कर ली और ज़्यादा वृद्धि ओर आ गए है हमारे व्हाटसएप महाराज अब तो यूँ लगता है की खबर लेना हो तो बस व्यक्ति को आनलाइन देख लो बस समझो सब ठीक है..

अपने स्टेट्स पर रोज़ ज्ञान की बातें समझा दो, चाहे वो स्वयं में धारण ना हो.. किसी से झगड़ा हो गया हो तो स्टेट्स पर कोई ताने भरी बाते लगा कर उसे समझा दो।

और बस बस बैठे-बिठाए यूँ ही लोगों को को ज्ञान देना हमारा फ़ेवरेट काम हो गया है… क्यूँकि क्या करना होता है सिर्फ़ फ़ारवर्ड ही तो करना है है ना?

व्यक्ति जो भी कोई सुविचार देखता है उसे मो० से फ़ारवर्ड कर दिया। कितना आसन लगता है ना! जबकि उस बात को स्वयं लिखने में भी आलस खाते है और दूसरों से उम्मीद रखते है की वो उस संदेश को अपने जीवन मे धारण करे।

बस एक क्लिक किया और हो गया। लेकिन मुश्किल है उस संदेश या ज्ञान भरी बात को अपने जीवन में फ़ारवर्ड करना।

इसके लिए बहुत ही धैर्य, संयम, समझ, सहनशक्ति की ज़रूरत होती है।

“ज्ञान देने से पहले स्वयं धारण करें”

‘एक बार एक बच्चा बहुत ज़्यादा गुड खाता था। इतना ज़्यादा की उसके घर वाले सभी परेशान थे उसकी इस आदत से सभी बहुत चिंतित हो गये वह उसे समझाने लगे की बेटा गुड़ खाओ अच्छा होता है पर अति नही.. ज़्यादा गुड खाना भी हानिकारक होता है सबने समझा लिया पर उस बालक ने किसी की एक ना सुनी.. तभी माँ को याद आया की वह बालक गांधी जी को अपना आदर्श मानता है अगर मैं उनके पास ले जाऊँ तो अवश्य ही बालक उनका कहना ज़रूर मान लेगा..

माता इस उम्मीद के साथ उस बालक को गांधी जी के पास ले गई की वे उसे समझाएँगे । जैसे ही माता गांधी जी के पास पहुँची तो गांधी जी के समक्ष बैठी एवं उन्हें इस समस्या के बारे में बताया ओर आग्रह किया की उस बालक को समझाए

माता बहुत उम्मीद के साथ बैठी थी
लेकिन ये क्या…गांधी जी ने उनकी समस्या सुनी और उस बालक को देखते रहे थोड़ा मुस्कुराए ओर कुछ पल मौन हो गये.. एवं बोले की आप चार दिन के बाद आना फिर मैं इस बालक को समझाऊँगा..।

माँ निराश हो कर पर चार दिन बाद की उम्मीद ले कर वहाँ से चली गई….
चार दिन बाद माँ फिर उस बालक को गांधी जी के पास ले के गई ।फिर गांधी जी ने उस बालक को समझाया और कहा की अब आप दो-तीन दिन बाद तक आना और देखना की इस बालक पर क्या असर हुआ..

गांधी जी की समझाइश उस बालक पर पर असर कर गई ओर उस बालक ने ज़्यादा गुड़ खाना छोड़ दिया ।माँ बहुत खुश हुई ओर धन्यवाद करने के लिए उस बालक को गांधी जी के पास ले गई

एवं धन्यवाद करते हुए उसने गांधी जी से एक प्रश्न किया..
“की आपने इस बालक को जो भी समझाया उसके लिए चार दिन बाद ही क्यू बुलाया था? आप उसी दिन भी तो उसे ये सब बातें समझा सकते थे ..सिर्फ़ समझना ही तो था ?
—तभी गांधी जी मुस्कुराए और बोले नही उस दिन मैं नही समझा सकता था क्यूँकि ……

चार दिन पहले मैं स्वयं ही ज़्यादा गुड़ खाता था।
इसके लिए मैंने पहले स्वयं इस आदत को त्यागा

किसी को हम ज्ञान तभी दे सकते है ना जब हममें स्वयं धारण करने की क्षमता हो? इसलिए मैंने चार दिन तक स्वयं में धारण करने के बाद उस बालक को शिक्षा दी….
गांधी जी पर आधारित शिक्षा हमे ये समझती है की यदि हम किसी को कोई ज्ञान दे रहे कोई संदेश दिखा रहे है तो पहले एक बार स्वयं के दर्शन कीजिए की कही मुझमें भी तो यह कमी नही?

क्यूँ की कहा गया है की भर-भर के मटकी ज्ञान देने वाले अक्सर उस ज्ञान का निरादर करते हुए नज़र आते है!
श्याद ये एक मानवीय गुण है कि जिस बात को अपने पर अमल करना कठिन होता है उसकी आशा हम दूसरों से करते है की वह कर लेगा.. पर हम ये क्यू भूल जाते है की जिस कार्य को करने में हम स्वयं समर्थ नही उसकी आशा हम दूसरों से क्यों करते है? वह भी तो उस कार्य को करने में कठिनाइयों का अनुभव कर सकता है। जो काम आसन होता है वह व्यक्ति स्वयं के लिए खोजता है

“ज्ञान देना आसन है और स्वयं निभाना कठिन”
और ऐसे ज्ञान देकर वह खुद को गर्वित अनुभव करता है। एक बात याद रखना 
 “बिना आचरण के ज्ञान इकट्ठा करना बोझ इकट्ठा करने के समान है  


——-तुलसीदास जी ने भी कहा है कि——-

पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
जे आचरहि ते नर न घनेरे।।

यदि व्यक्ति स्वयं आदर्शों का पालन करने में लग जाए तो उसे उपदेश देनें की ज़रूरत नही होगी।
लेकिन वर्तमान समय की स्तिथि है..

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे,सुबह को भेजे शाम को भूले”

 इस पर कुछ लाइन लिखती हूँ की..

देख रहे, दुनिया का जीवन
अपना जीवन देखे कौन?
देते ज्ञान, सबको बन ज्ञानी
क्यू नही निकालते स्वयं में ख़ामी
जिस दिन निकलेगी स्वयं में ख़ामी
उसी दिन बनोगे तुम सच्चे ज्ञानी..

हrshi ठाkur ✍️
मै धर्म व अध्यात्म की कड़ी, ईश्वरीय मत व प्रेरणा के अधीन हूँ। निरक्षर को शिक्षा देना व अध्यात्म के प्रति जागरूक करना है इसलिए 15 वर्षों से शिक्षिका हूँ। जीवन का उद्देश समाज सेवा एवं अध्यात्म सेवा है इसी को मै अपना परमसौभाग्य मानती हूँ।
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कुमार

Good