शिव लिंग का अर्थ ?

शिवलिंग को शिव (5 तत्व अर्थात प्रकर्ति या अर्थात ब्रह्मांड) और देवी शक्ति (पार्वती) (अर्थात हम सब मनुष्य आत्मा अर्थात पुरुष तत्व अर्थात चेतन शक्ति) का प्रतिक भी माना जाता है। अर्थात इस संसार में पुरुष व् स्त्री दोनों सामान वर्चस्व हैं।

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लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है…
जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिश्न कहा जाता है।

>अतः शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक अथवा जाति अथवा वर्ग अथवा समूह अथवा गुण

>पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। चूंकि धरती पर मनुष्य असंख्य है अतः इन्हे एक प्रतीक के रूप में लिंग शब्द जाति/वर्ग/समूह के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। अतः ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना असंभव है न?

“शिवलिंग”’क्या है ?

शिव ,शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष माना जाता है अतः शिवलिंग, शिव के अन्य  प्रतीको (गुण) को एक स्थिर तत्व में हमने ही ढाला जिसे लिंग कहा गया है।

स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।

शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (Axis) ही लिंग है।

शिव अनन्त है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।

शिव को समस्त ब्रह्मांड में चराचर (सर्वेयापी) मानते हुये और इसके रूप के अस्तित्व की अनिश्चितता होने के कारण शिव को समस्त संसार का एकजुट मानते हुये एक प्रतीक /समूह माना। इसलिए शिव शब्द के आगे लिंग शब्द लगाया गया है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं।
जैसे एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो
सूत्र का मतलब डोरी/धागा ,गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है।

उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।

धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है।

तथा कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)

शिव गुणों का सागर है

अतः शिवलिंग पवित्रता का प्रतीक है|

प्राचीन काल में हम दीपक ज्योति को प्रतिमा बनाया गया क्योकि ऋग्वैदिक काल में हम अग्नि को आकाश का देवता मान कर पूजते थे

(आज भी सभी धर्म में सभी धर्म और पंतो में अग्नि का प्रयोग वर्ष में किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठान में जरूर होता है)

और अग्नि के माध्यम से प्रकति को भेंट चढ़ाते थे अग्नि को पवित्र माना जाता था पारसी धर्म में ये परम्परा आज भी व्याप्त है।

अतः बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं | लेकिन हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके |

इस लिंग का रूप दीर्घवर्तीय(अंडाकार) है । आश्चर्यजनक बात ये है कि हमारे ब्रह्मांड का आकार और हमारा सौर सिस्टम के ग्रह भी इसी आकार में घूमते है।

शिवलिंग को शिव (5 तत्व अर्थात प्रकर्ति या अर्थात ब्रह्मांड) और देवी शक्ति (पार्वती) (अर्थात हम सब मनुष्य आत्मा अर्थात पुरुष तत्व अर्थात चेतन शक्ति) का प्रतिक भी माना जाता है। अर्थात इस संसार में पुरुष व् स्त्री दोनों सामान वर्चस्व हैं।

अब बात करते है योनि शब्द पर-

मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनी’जीव-जंतु योनि

योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है….

जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है नासमझ बेचारे।

इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं।

जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनी बताई जाती है। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं।

अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है।

मनुष्य योनी

पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है।

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bk krishna

points are good