Home Gita Gyan गीता अध्याय 9, 10, 11 & 12 E.47 परमात्मा का कर्त्तव्य

E.47 परमात्मा का कर्त्तव्य

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गीता ज्ञान का आध्यात्मिक रहस्य (नवाँ, दसवाँ, गयारहवाँ एंव बारहवाँ अध्याय)

“समर्पण भाव”

The Great Geeta Episode No• 047

दैवी ऐश्वर्यों

अर्जुन भगवान से आग्रह करता है कि कृपा करके विस्तार पूर्वक हमें उन दैवी ऐश्वर्यों के बारे में बतायें और यह भी कि मैं किस तरह आपका निरन्तर चिंतन करूं ! आपका स्मरण किन-किन रूपों में किया जाए ? ये मुझे स्पष्ट करो !

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उसकी जिज्ञासा के प्रति भगवान उसे आगे बताते हैं कि हे अर्जुन !

मेरा ऐश्वर्य असीम है ! क्योंकि परमात्मा सर्वगुणों के सागर है , वह अनंत है ! इसलिए परमात्मा अनंत गुणों के भन्ड़ार है ! सर्वशक्त्तिमान. भगवान कहते हैं , मेरा ऐश्वर्य असीम है !

मैं आदि-मध्य-अन्त का ज्ञाता हूँ ! संसार के तीनों कालों को मैं जानता हूँ ! सर्व आत्माओं में सर्वश्रेष्ठ परमात्मा है ! फिर भगवान ने एक-एक करके इक्कीस (21) श्रेणी में सर्वोच्च स्थिति का वर्णन कर अपने असीम स्वरूपों की विशोषतायें स्पष्ट की !

21 चीजों का वर्णन

21 चीजों की जो विशोषतायें होती हैं उसके आधार पर कोई अपनी वास्तविकता का वर्णन करना चाहे तो कैसे ?

अर्थात् वो ईश्वर्य जो आँखों से देखा नहीं जाता है ! उनके ऐश्वर्य की असीम महिमा है, उसको कैसे वर्णन करें ?

इसलिए इक्कीस चीजों को लेकर के एक-एक चाहे वो भौतिक जगत की हो या आध्यात्मिक जगत की , का वर्णन करते हुए , सर्वोच्च स्थिति जो उसकी होती है, उससे अपनी तुलना की है !

कहा वह जैसे प्रकाश में तेजस्वी सूर्य के समान है !

अब भगवान अपने असीम ऐश्वर्य का वर्णन करते हैं कि मेरा दिव्य स्वरूप कैसा है ? दुनिया में जितने भी सूर्य हैं , उसमें जो तेजस्वी सूर्य माना जाता है , ऐसे तेजस्वी सूर्य के समान मैं हूँ !

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मेरी दिव्य विभूति का अन्त नहीं है ! इस तरह इक्कीस श्रेणी का वर्णन करते हुए उसकी सर्वोच्च शक्त्ति की , असीम ऐश्वर्य की महिमा बतायी और कहा मेरी दिव्य विभूति का अन्त नहीं है, कितना भी वर्णन करता जाऊं तो भी असीम है ! सारा ऐश्वर्य , सौन्दर्य तथा तेजस्वी सृष्टियां , वह मेरे स्वरूप का एक अंश है !

संसार में जो कुछ भी आप देखते हो , मेरी तुलना में कुछ भी नहीं है ! ये भगवान ने स्पष्ट कर दिया ! इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा कण-कण में व्यापक है , नहीं ! भावार्थ समझो ! भगवान स्थूल धरातल पर बात नहीं करते हैं ! आगे कौन सी 21 चीजों का वर्णन किया है , उस के बारे में बताया गया है !

जब अर्जुन भगवान से आग्रह करता है कि कृपा करके विस्तार पूर्वक हमें उन दैवी ऐश्वर्य के बारे में बतायें और मैं किस तरह आपका निरन्तर चिंतन करूं ? इसलिए इक्कीस चीजों को लेकर के एक-एक चाहे वो भौतिक जगत की हो या आध्यात्मिक जगत की , का वर्णन करते हुए सर्वोच्च स्थिति जो होती है , उससे अपनी तुलना की है !

  1. 🌙 कहा कि नक्षत्रों में चंद्रमा जैसी शीतलता है , तेजस्व सूर्य समान है , लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके नज़दीक भी कोई नहीं जा सकता ! बाहर खड़े रहो धूप में तो क्या उसकी तेजोमय किरणें चुभती हैं ? भगवान की किरणें कोई चुभने वाली नहीं हैं ! तेजस्वी ज़रूर हैं सूर्य के समान लेकिन चंद्रमा जैसी शीतलता भी उसमें समायी हुई है ! वो इतना शीतल प्रकाश है कि जो दिल को भी शीतल कर देता है , चुभने वाला प्रकाश नहीं !
  2. फिर कहा समस्त पर्वतों में मेरू अर्थात् सर्वोच्च हूँ मैं !
  3. समस्त पुरोहितों में बृहस्पति और
  4. समस्त सेना नायकों में कार्तिकेय ! इतना शक्त्तिशाली है, कल्याणकारी भी है !
  5. समस्त जलाशयों में समुन्द्र अर्थात् सर्वगुणों में सागर की तरह अनंत है ! HE is Ocean of love, bliss, knoweledge , peace , might , purity & happiness
  6. समस्त महर्षियों में भृगु की तरह अर्थात् जिसकी विचारधारा सब बातों में उच्च है !
  7. वाणी में दिव्य ओंकार अर्थात् सर्वश्रेष्ठ ध्वनि है ! तो इस तरह परमात्मा की ध्वनि भी सर्वश्रेष्ठ है ओंकार की तरह और समस्त अंचलों में हिमालय की तरह अंचल , कोई उसको हिला नहीं सकता !
  8. समस्त वृक्षों में पीपल है ! पीपल क्यों ? आज दुनिया में भी पीपल और तुलसी पूजा क्यों की जाती है ? कारण है , पीपल और तुलसी दो ही ऐसे हैं जो 24 धंटा ऑक्सीजन प्रदान करता हैं ! लोगों को प्राण वायु देते हैं ! इसलिए उसकी पूजा करते हैं कि कोई उसको काटे नहीं ! साथ ही साथ तुलसी के अन्दर जो औषधि गुण हैं , वे भी महान हैं , इसी तरह परमात्मा भी 24 धंटा कल्याणकारी है ! सर्व के प्रति शुभ ,जैसे कि प्राण वायु देने का कार्य , इंसान को सकाश व शक्त्ति देने का कार्य करते हैं !
  9. सिद्ध पुरूषों में कपिल है !
  10. गजराजों में ऐरावत है ! इतना सुन्दर दिव्य स्वरूप है !
  11. मनुष्य में राजा अर्थात् सर्वोच्च अथॉरिटी हैं परमात्मा !
  12. हथियारों में वज्र है ! कोई उसको खत्म नहीं कर सकता !
  13. गायों में सुरभि है , सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले !
  14. भक्त्तों में भक्त्तराज प्रह्लाद है ! अर्थात् कितना अनन्य भाव है , सर्व के प्रति !
  15. पशुओं में सिंह शक्त्तिशाली और
  16. पक्षियों में गरूड़ है ! अर्थात् तीक्ष्ण बुद्धि है उसकी !
  17. शस्त्र धारियों में राम है ! अर्थात् राम को जैसे आदर्श माना गया हर बात में , व्यवहार में , व्यक्त्तित्व आदि में , सब बातों में आदर्श बताया है ! ऐसे परमात्मा भी सर्वश्रेष्ठ अर्थात् परम आत्मा है !
  18. नदियों में गंगा अर्थात् इतना पवित्र व निर्मल है वो !
  19. समस्त विद्या में अध्यात्म विद्या अर्थात् परमात्मा के द्वारा दी गई ऊंचें ते ऊंची विद्या !
  20. समस्त रितुओं में वसंत रितु अर्थात् सदाकाल वसंत की तरह सर्व के प्रति स्नेह का सुन्दर प्रवाह चलता रहता है परमात्मा का !
  21. समस्त मुनियों में व्यास की तरह , वह समस्त सृष्टि का बीज रूप हूँ !
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अविनाशी स्वरूप

फिर अर्जुन ने कहा कि आपने जो परम गोपनीय आध्यात्मिक ज्ञान सुनाया उससे मेरा अज्ञान और मोह नष्ट हो गया है ! इसलिए यदि मानते हो कि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना संभव है तो हे योगेश्वर , आप अपने अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराइए !

भावार्थ यह है कि हमें इस बात का स्मरण होता है कि किस प्रकार भगवान अपने भक्त्तों के ह्रदय में स्थित उनके अज्ञान अंधकार को नष्ट कर देते हैं और उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान कर समर्थ बनाते हैं ! अर्थात् सूक्ष्म विषय को ग्रहण करने की बौद्धिक क्षमता प्रदान करते हैं ! व्यक्त्ति का अनन्य भाव होता है तो परमात्मा द्वारा वह दिव्य चक्षु प्राप्त करता है, जिससे सूक्ष्म विषयों को ग्रहण करने की बौद्धिक क्षमता मिलती है !

इस तरह से अब संजय बताता है कि अर्जुन ने क्या-क्या देखा ! संजय ने अपने दिव्य चक्षु से देखा , क्योंकि दिव्य चक्षु का वरदान संजय को प्राप्त था ! उसने उस दिव्य स्वरूप का वर्णन किया कि आकाश में एक साथ हज़ारों सूर्य उदय होने से जितना प्रकाश होता है वो उस परमात्मा के प्रकाश के सदृश्य है !

इतना असीम प्रकाश था और आश्चर्यचकित हर्षित रोमों वाला धंनजय परमात्मा को सिर झुकाकर हाथ जोड़कर के प्रमाण करता है ! ये दिव्य स्वरूप जो कहा , सभी प्रकाशों में तेजस्वी सूर्य के समान है , लेकिन वो तेज चुभने वाला नहीं , नक्षत्रों में चंद्रमा के समान !

इस प्रकार से भगवान ने अपने इक्कीस श्रेणी के सौंदर्य का वर्णन किया जिसमें सर्वोच्च स्थिति को प्रकट किया वो स्वरूप संजय भी अपनी दृष्टि से देखते हुए और ये देखता है कि कैसे अर्जुन झुक जाता है और प्रमाण करता है उस दिव्य स्वरूप को ! उसके बाद वह दूसरा स्वरूप देखता है ! हज़ार सूर्यों से तेजोमय स्वरूप, परमात्मा ने अपना स्वरूप दिखाया !

श्रीकृष्ण कौन है और वो कौन है ?

उसके बाद कमल आसन पर ब्रह्या जी एवं शंकर को देख रहे हैं ! अब ये विराट रूप किस का हैं ? परमात्मा का नहीं है ! श्रीकृष्ण का है ! जिन तन में उन्होंने अवतरण किया था वा जिस तन का माध्यम बनाया था- गीता का ज्ञान सुनाने के लिए , उसके भी स्वरूप का दर्शन कराता है कि परमात्मा कौन और ये कौन है ? श्रीकृष्ण कौन है और वो कौन है ?

Geeta Gyan in Hindi
Spiritual Explanation of Bhagawad Gita in Hindi
  • परमात्मा आदि , मध्य और अन्त रहित अनंत सामर्थ्य से युक्त्त हैं , जबकि श्रीकृष्ण ने इस संसार में समय प्रति विभिन्न स्वरूप में जन्म लिया है !
  • सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त में समय प्रति समय उसने जन्म लिया है ! अनंत सामर्थ्य युक्त्त स्वरूप में जन्म लिया !
  • शंख , चक्र , गदा , पद्मयुक्त्त , प्रकाशमान तेज पुंज स्वरूप का वो अपनी बुद्धि से ग्रहण नहीं कर पा रहा है !
  • परमात्मा इस जगत के परम आश्रय , शाश्वत् धर्म के रक्षक हैं ! जबकि श्रीकृष्ण समय प्रति पुनः जन्म लेकर के इस संसार में विभिन्न कार्य अर्थ जन्म लेता है , लेकिन वो परमात्मा नहीं है !
  • इसलिए परमात्मा का दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार पहले कराया कि वो असीम स्वरूप कौन-सा है !
  • भगवान को कहते हैं करन करावनहार ! वो किसके द्वारा कार्य कराता है ?
  • वो ब्रह्या , विष्णु और महेश ( शंकर ) के द्वारा यह कार्य कराते हैं , जो कि आदि , मध्य और अन्त तीनों समय में अपने अनंत सामर्थ्य प्रदान कराते हैं !
  • सामर्थ्य प्रदान करते हुए वे संसार में अपने स्वरूप को , विशेष रूप से रचकर के , इस संसार में शाश्वत् धर्म की रक्षा करने हेतू , ऐसे दिव्य स्वरूप में आते हैं ! लेकिन मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाता है !
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