गीता ज्ञान का आध्यात्मिक रहस्य (पहला और दूसरा अध्याय)

“गीता-ज्ञान, एक मनोयुद्ध या हिंसक युद्ध”

The Great Geeta Episode No• 014

भगवान ‘ शरीर और आत्मा ‘ के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि

कैसे देह में देहधारियों की वाल्यवस्था , यौवनावस्था और बुढ़ापा ये तीन अवस्थायें होती है !

इसी प्रकार दूसरी देह की प्राप्ति भी एक परिवर्तित अवस्था है !

इसमें आत्मा का कभी भी नाश नहीं होता है और ना ही आत्मा के ऊपर प्रकृति का कोई प्रभाव पड़ता है अर्थात् न अग्नि उसे जला सकती है , न पानी उसको गीला कर सकता है, न हवा उसको सुखा सकती है , न तलवार उसको काट सकती है, आत्मा न कभी मरती है और न ही जन्म लेती है, यह अजन्मा, अविनाशी, शाश्वत और आदि युगीन है !

शारीरिक वध से आत्मा का वध नहीं होता , प्रकृति के पांचों तत्व भी मिलकर आत्मा का कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं !

जब आत्मा सदगुणों से भरपूर होती है तो उसकी चमक बढ़ती है और जब विषय विकारों के वश में हो जाती है तब उसकी आभा कम हो जाती है !

सांसारिक बन्धनों में फंसकर आत्मा कमज़ोर हो जाती है और सांसारिक बन्धनों से मुक्त्त रहने पर वह शक्त्तिशाली बन जाती है !

आत्मा की शाश्वतता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि जैसे व्यक्ति नये वस्त्र धारण करने के लिए पुराने वस्त्रों का त्याग करता है , वैसे ही आत्मा नया शरीर धारण करने से पुरानी देह का त्याग करती है !

ये शाश्वत् नियम है कि जिसने भी शरीर धारण किया है , उसे शरीर छोड़ना ही पड़ता है !

आत्मा अविनाशी है , शरीर अविनाशी नहीं है अर्थात् शरीर विनाशी है !

भगवान ने अर्जुन को कहा -हे अर्जुन ! स्वधर्म को देखकर भी तुम भय योग्य नहीं हो , क्योंकि धर्मयुक्त्त युद्ध से बढ़कर अन्य कोई परम कल्याणकारी मार्ग नहीं है !

यदि तू धर्मयुक्त्त युद्ध नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति दोनों को खोकर पाप का भागी बनेगा !

आत्मिक अर्थात् आत्मा की संपत्ति ही स्थिर संपत्ति है !

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